याद आते है वो दिन

क्या दिन थे वोबर्फ़ीली रातों में घूमने निकल जाना ना किसी का ख़याल ना ख़ुद की फ़िक्र ।पढ़ते भी थे कुछ घंटे यूँ तोगुनगुनाते बंक मार जाना रातों में दारू पीते जबसुट्टा ख़त्म हो जाना और दौड़ना हर तरफ़ठुड्डे ढूँढ कर लाना ना किसी का ख़याल ना ख़ुद की फ़िक्र ।गर्ल्फ़्रेंड कोई नयी बना ले तो घेर कर उसे सबका बैठ जाना बैठ कर उसका बातें बताना … Continue reading याद आते है वो दिन

अच्छे पल

घूमते आइने सेइस संसार मेंकभी कुच्छ अच्छे कुच्छ बुरे पल होते है जीना इन्हें स्वाभाविक है क्योंकि ऐसे ही पलों सेहम तक़दीर सीते हैं जब किसी अवसर पर मित्र इक्कठे होते है ,तब साँसे गरम और मुख पर मुस्कान होती है ,उस पल का अहसास एक नयी तरंग ले आता है ,क्योंकि ऐसे ही पलों से हम तक़दीर सीते हैं ।कल गया है जो … Continue reading अच्छे पल

पूर्णविराम

जीवन चक्र में फँस करउद्वेग में चलता रहा नासमझबुद्धिहीनता में खड़ा रहा, अर्धसत्य के सत्यापन को पूर्णविराम समझता रहा इंसान की यही कहानी जीवन चक्र में फँस कर उद्वेग में चलता रहा।जीवन पथ के उतार चढ़ाव रितियों की ऊँच नीच में बढ़ता हुआ चलता रहाविघन आए जबना रुका वो ना थमा जीवन चक्र में फँस कर उद्वेग में चलता रहा।बखानता हुआ पल्लव उत्तेजना में बोल रहा अर्धविराम जीवनसत्य … Continue reading पूर्णविराम

ये लम्हा

जब साँस छूटेगी ये लम्हा याद आएगाकितना अकेला दूर चला आया हूँ मैंरोता सिसकता सा खड़ा था मैं,अंधेरे बरपाए था दूर तलक अपनी छाया से भी अभिग्न था मैंजब साँस छूटेगी ये लम्हा याद आएगा।हाथ जोड़े खड़ा कंपकंपाया था मैं प्रभु प्रत्यक्ष होते , कभी नहींयूँही कभी रोता कभी हँसता आया था मैंजब साँस छूटेगी ये लम्हा याद … Continue reading ये लम्हा

सहिष्णुता

जीवन के सात रंग यही कहे इंसानकभी ख़ुशी कभी ग़म दगा और इल्ज़ाम यही रास्ते पर चल कर ऊँचा रखे स्थान कहाँ गयी सहिष्णुता क्या कर रहा इंसान ।अपनो से ही कर दग़ा पाए सुख चैन खोया जो जीवन का सुख नासमझ इंसान रोया जब समय पलट आया समान कहाँ गयी सहिष्णुता क्या कर रहा इंसान ।कर स्पर्धा उन लोगो … Continue reading सहिष्णुता

उल्लेखनीय

इस जीवन की यही कहानी , कुछ नयी कुछ पुरानीकरते सभी यहाँ कुछ प्रयास , ढूँढते रहते एक आस क्या करें ऐसा, जिसे देख आयें सभी पासउल्लेखनीय हो कर्म ऐसा  , ये हो सफल प्रयास ।मैं भी खड़ा उद्वेग में , करता रहूँ विश्लेषण , होता क्या है उल्लेखनीय , कोई आए समझाए, हर तरफ़ जब देखूँ मैं, सिर्फ़ … Continue reading उल्लेखनीय

माया है ये संभल जाओ तुम।

जीवन है  एक दलदल , धंसते जाना  है यही विधि का विधान,फँसते जाना है ये काम और  कर्म दोनो, माँगे समय  अपार माया है  ये, समझ  जाओ तुम  करो तिरस्कार  ।काम लोभ  में लगे  सभी जन ,झोंका सभी  को बारामबारसंतुष्टि कभी  हुई नहीं, दिखते दृश्य  अपार  माया है  ये, समझ  जाओ तुम  करो तिरस्कार  ।कर्म में  लगे सभी  जन करते  अपना उद्धार नए आयाम  पाकर भी प्रयास करें  अपारपा आशीर्वाद  प्रभु का पाया जब  धन अपारखोया सबकुछ, पाया नहीं  समय किसी  प्रकार,माया है  ये, समझ  जाओ तुम  करो इसका  तिरस्कार ।हे मित्र  कहता पल्लव सुनो तुम  एक बात करो अभ्यास  प्रतिदिन , पाओगे  तभी उद्धार उत्तेजना और  जीवन पर पाओगे विजय हर बार,धरो ध्यान  उसका , मिलेंगे तारनहारहो अग्रसर  अपने पथ  पर,पाओ प्रियजनो का  प्यार,नहीं फँसो  तुम , ना  ही धँसो  तुम,माया है  ये, समझ  जाओ तुम  करो इसका  तिरस्कार ।

तुम्हें पाकर निहाल हूँ मैं

तुम्हें पाकर निहाल हूँ मैं,निहारता हूँ तुम्हें जब ज़िंदगी कहे बहाल हूँ मैं ,मुस्कुराती रहो हर पलयही एक ख़याल हूँ मैं,जीवन  में आयी हो परी  बन करविश्वामित्र सा साधना से  छूटा हूँ  मैं,तुम बस  यूँही चलती  रहो संग  मेरेतब हर  कुरुक्षेत्र से  अछूता हूँ  मैं।देवी हो  तुमयहाँ  विराजी हो ,एक परी  है संग  खिल खिलाती हो ,उठो चलो  तुम इतरा भी दो देखें सभी तुम मुझसे मुख़ातिब हो,ईर्ष्या से भरे हैं सब देख क्यों तुम इस क़दर इठलाती हो।मेरी अर्द्धांगिनी  हो तुम प्रिया हो ,गुरु हो  कभीकभी  सखा हो ,लेकर चलूँ तुम्हें अंतत् उस स्वर्ग में देवों के संग विराजी … Continue reading तुम्हें पाकर निहाल हूँ मैं

मित्रों की पीड़ा

श्री हरी  ने जिसको  समझा, ऐसी पीड़ा  का उल्लेख  करता हूँ,रो नहीं  सकता देख,  वो दर्द  बयान करता  हूँमित्र की  पीड़ा देख  यूँही खड़ा  रहता हूँ  ।क्या करूँ  जब वो  रोता   है, पीठ थपथपाता  हूँ यूँही  खड़ा रहता  हूँराय लेता  है वो,  अनुभव सम्पूर्ण  देता हूँ,मित्र की  पीड़ा देख  यूँही खड़ा  रहता हूँ  ।जब संगिनी  उसकी हो विमुख, उमंग  देता हूँआँखें भरी  होती हैं  उसकी, सवाल  उठा देता  हूँ,उत्तर कोई  मिलता नहीं,  जगह देता  हूँ ,मित्र की  पीड़ा देख  यूँही खड़ा  रहता हूँ  ।सब ठीक  हो उसके  साथ, जीवन  में मृत्यु योग  देख उसका,  आँखें उड़ेल  देता हूँ,आस बँधा  उसकी, ख़ुद  को झिला  लेता हूँ मित्र की  पीड़ा देख  यूँही खड़ा  रहता हूँ  ।वो चलता  है रुकता  नहीं जीवन  की दौड़  में ,तो यूँही  थामे बाँहें  उसकी, कुछ  पल बिठा  लेता हूँ तर्क वितरक  से उसे ,  उलझनों से  हटा लेता  हूँमित्र की  पीड़ा देख  यूँही खड़ा  … Continue reading मित्रों की पीड़ा