Month: November 2015

ये लम्हा

कितना अकेला दूर चला आया हूँ मैं रोता सिसकता सा खड़ा था मैं, अंधेरे बरपाए था दूर तलक अपनी छाया से भी अभिग्न था मैं जब साँस छूटेगी ये लम्हा याद आएगा। […]

मित्रों की पीड़ा

श्री हरी  ने जिसको  समझा,  ऐसी पीड़ा  का उल्लेख  करता हूँ, रो नहीं  सकता देख,   वो दर्द  बयान करता  हूँ मित्र की  पीड़ा देख   यूँही खड़ा  रहता हूँ  । क्या करूँ  जब वो  रोता   है,  पीठ थपथपाता  हूँ  यूँही  खड़ा रहता  हूँ राय लेता  है वो,   अनुभव सम्पूर्ण  देता हूँ, मित्र की  पीड़ा देख   यूँही खड़ा  रहता हूँ  […]