मित्रों की पीड़ा

श्री हरी  ने जिसको  समझा,  ऐसी पीड़ा  का उल्लेख  करता हूँ, रो नहीं  सकता देख,   वो दर्द  बयान करता  हूँ मित्र की  पीड़ा देख   यूँही खड़ा  रहता हूँ  । क्या करूँ  जब वो  रोता   है,  पीठ थपथपाता  हूँ  यूँही  खड़ा रहता  हूँ राय लेता  है वो,   अनुभव सम्पूर्ण  देता हूँ, मित्र की  पीड़ा देख   यूँही खड़ा  रहता हूँ  । जब संगिनी  उसकी  हो विमुख,  उमंग  देता हूँ आँखें भरी  होती हैं  उसकी,  सवाल  उठा देता  हूँ, उत्तर कोई  मिलता नहीं,   जगह देता  हूँ , मित्र की  पीड़ा देख   यूँही खड़ा  रहता हूँ  । सब ठीक  हो उसके  […]