Month: November 2015

याद आते है वो दिन

क्या दिन थे वो बर्फ़ीली रातों में  घूमने निकल जाना  ना किसी का ख़याल  ना ख़ुद की फ़िक्र । पढ़ते भी थे कुछ घंटे यूँ तो गुनगुनाते बंक मार जाना  रातों में दारू […]

अच्छे पल

घूमते आइने से इस संसार में कभी कुच्छ अच्छे  कुच्छ बुरे पल होते है  जीना इन्हें स्वाभाविक है  क्योंकि ऐसे ही पलों से हम तक़दीर सीते हैं  जब किसी अवसर पर  मित्र इक्कठे […]

पूर्णविराम

जीवन चक्र में फँस कर उद्वेग में चलता रहा नासमझ बुद्धिहीनता में खड़ा रहा,  अर्धसत्य के सत्यापन को  पूर्णविराम समझता रहा  इंसान की यही कहानी  जीवन चक्र में फँस कर  उद्वेग में चलता रहा। […]

ये लम्हा

कितना अकेला दूर चला आया हूँ मैं रोता सिसकता सा खड़ा था मैं, अंधेरे बरपाए था दूर तलक अपनी छाया से भी अभिग्न था मैं जब साँस छूटेगी ये लम्हा याद आएगा। […]

सहिष्णुता

जीवन के सात रंग यही कहे इंसान कभी ख़ुशी कभी ग़म दगा और इल्ज़ाम यही रास्ते पर चल कर ऊँचा रखे स्थान कहाँ गयी सहिष्णुता क्या कर रहा इंसान । अपनो से […]

उल्लेखनीय

इस जीवन की यही कहानी , कुछ नयी कुछ पुरानी करते सभी यहाँ कुछ प्रयास , ढूँढते रहते एक आस क्या करें ऐसा, जिसे देख आयें सभी पास उल्लेखनीय हो कर्म ऐसा […]

मित्रों की पीड़ा

श्री हरी  ने जिसको  समझा,  ऐसी पीड़ा  का उल्लेख  करता हूँ, रो नहीं  सकता देख,   वो दर्द  बयान करता  हूँ मित्र की  पीड़ा देख   यूँही खड़ा  रहता हूँ  । क्या करूँ  जब वो  रोता   है,  पीठ थपथपाता  हूँ  यूँही  खड़ा रहता  हूँ राय लेता  है वो,   अनुभव सम्पूर्ण  देता हूँ, मित्र की  पीड़ा देख   यूँही खड़ा  रहता हूँ  […]