Poetry

कल हमारी महफ़िल में कुछ दोस्त यार थे

कल हमारी महफ़िल में कुछ दोस्त यार थे |
जामों कि खनक थी कुछ यारों के दरमियाँ |
सुनने और सुनाने में मगर शोर बहुत था|
खाली पड़े हैंजाम ज़राइनकी भी तो सुन लें|
यादें पुरानी ताज़ीकर  कुछ लुफ्त ले लिया|
सन्नाटे की आवाज़ है, इनकी भी तो सुन लें|
किससे कहें ये यार हम किस को सुनाएँ|
दिल से जो निकली है  उसकी भी तो सुन लें|
चुप -चाप मेरे साथ मेरे घर को जो सजाए|
कुछ अपनी कहें उससे, कुछ उसकी भी तो सुन लें|
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