तुम भी ढूँढो

भटकते हैं लोगकरने सपने को साकार,कोई बेचता ख़ुद कोकोई निकल पड़ता बेचनेखुदा का आकार,अज्ञानतावश भूल मर्यादा और जड़ों को अपनी,बस चल पड़ते हैं खोज में पता नहीं किसकीये इस प्रकार,कर्म क्षेत्र बना घर से दूरइंसान परिश्रम करें भरपूर,पा जाते सम्पत्तिउठते-बढ़ते महकते जैसे कपूर।व्याकुलता स्पष्ट हो जाती जब खो देते हैं होश,रोते बिलखते छुपा लेते हैं वो अपने अश्रु,पूर्ण मन और जतन से उठाए घर-परिवार का … Continue reading तुम भी ढूँढो