मित्र तुम समय हो

इच्छाओं से उत्पन्न हो सृष्टी की रचना करते हो तुम,मेरे दृष्टिकोण की रचना कर सार्थक करते हो तुम,सृष्टी जैसे मै चाहता हूँ वैसे ही हो जाती अनुरूप मेरी इचछाओं के अनूकूल रचनात्मक हो दिखते हो तुम|अज्ञानता से परिपूर्ण हो दुखों को समेटे था मै,ढूंढता फिरा चहुंओर तुम्हे पाने को आतुर था मै,बैठे बाध्य मेरी सोच … Continue reading मित्र तुम समय हो

आईना

अटल पथ पर चलते रहकर इच्छाओं को दृढ़ता प्रदान करो यही उल्लेख ध्यान मे धरकर अपने कर्म पर ध्यान धरो |चाहते हो जो हो जाता है ध्यान धर उसे दृढता प्रदान करोसमझो इस रहस्य को और अपनी जिन्दगी को अंजुली मे भरो|जो हो रहा तुम्हारे साथ वह आईना है तुमहारी इच्छाओं काइस आईने को स्पष्टता  … Continue reading आईना

कश्मकश में बितती ज़िंदगी

कश्मकश में बितती ज़िंदगी, नासमझ से खड़े हैं हमकुछ खट्टी कुछ मीठी यादों के सहारे खड़े हैं हम अपनी ज़िंदगी को ख़ुद उलझाने की आदत है यहाँ गीता के ज्ञान का सीधा रास्ता भूल कर खड़े हैं हम।प्रभु से बात हुई तो असमंजस में खड़े हैं हम सत्य के कथन को समझते यूँही खड़े हैं हमकहते हैं वो … Continue reading कश्मकश में बितती ज़िंदगी