*मेरा कोई भी दोस्त* *बूढ़ा नहीं हुआ….!*

*मेरा कोई भी दोस्त*
*बूढ़ा नहीं हुआ….!*

सच्चाई में ढ़ले हैं ,
सब अब भी मनचले हैं ।
कृपा है सब पे रब की ,
पर्वत से सब खड़े हैं ।

ना दर्द कोई दिल में ,
छा जाऐं वो महफिल में ।
वो सबके काम आयें ,
जो भी हो मुश्किल में ।

नहीं कोई है घमंडी ,
ना ही पैसे का ग़ुरूर ।
यारों के काम आयें ,
बस ये ही इक सुरुर ।

इक दूसरे पे जान ये ,
छिड़कते हैं सब के सब ।
मिलते ही ये कहेंगे ,
अबे,अब मिलेगा कब ।

कोई पी रहा है दारू ,
कोई बन गया है साधू ।
मस्ती में जी रहे हैं ,
नहीं कोई भी बेकाबू ।

बालों में डाई सबके ,
काॅलर पे टाई सबके ।
लाली ये दोस्ती की ,
चेहरे पे छाई सबके ।

कभी गर्लफ्रेंड की बातें ,
कभी उससे मुलाकातें ।
करते नहीं थकते हैं ,
कट जातीं कई रातें ।

बच्चे हैं बराबर के ,
पर सब ही सयाने हैं ।
हेमा से करीना तक ,
ये सबके दीवाने हैं ।

हे प्रभु , मेरे ख़ुदा तू ,
इन सबको स्वस्थ रखना ।
जितने थे कभी पहले ,
इन्हें और मस्त रखना ।

…..मेरा कोई भी दोस्त
बूढ़ा नहीं हुआ ।

– poet unknown

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simple, humble, ordinary, down to the roots

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