पहलू में

वक्त गुजरता है, लम्हे चले जाते कशमकश के पहलू मेंशाम हो जाती है, मंजर चले जाते उदासी के पहलू में। बैठे ताक रहे थे खिड़की से बाहर अंधेरों कोचांदनी नजर आयी दूर वादियों के पहलू में। कुछ मुस्कुराहट सी आयी लबों पर हमारे जैसे एक आग समाई हो सैलाब के पहलू में। खिंचाव वो सीने … Continue reading पहलू में

महफ़िल-ए-जाँबाज़ को देख मुस्कुरा कर चल दिए

Dedicated  to all soldiers महफ़िल-ए-जाँबाज़ को देख मुस्कुरा कर चल दिए,वो बैठे थे नूर-ए-जंग की कामयाबी की मिसाल दिए।उस जाँबाज़ के अपनो के आँसुओं को देख रो पड़े छाती उनकी चौड़ी थी आँखों में आँसुओं को लिए ।एक नादान भी था माँ की अगोश में छिपा हुआ नज़रें तलाशतीं जाँबाज़ को उसकी, देख कर चल दिए ।क्या इनायत-ए-खुदा … Continue reading महफ़िल-ए-जाँबाज़ को देख मुस्कुरा कर चल दिए

वक़्त करवट बदलता है आवाज़ नहीं होती

वक़्त करवट बदलता है आवाज़ नहीं होती,वो आग़ाज़ करता है तो आवाज़ नहीं होती ।हम झेलते हुए मार वक़्त की ताक़त को देखते हैं वक़्त जब ना हो साथ ज़ोर-ए-परवाज़ नहीं होती।हमने रखा था हम-परवाज़ वक़्त को हार कर वक़्त के साथ इज़ं-ए-परवाज़ की आवाज़ नहीं होती ।तय्यार रहना हमारी आदत बनायी थी माँ ने साथ वक़्त के … Continue reading वक़्त करवट बदलता है आवाज़ नहीं होती

कुछ जान-ए-जिगर साथ है

कुछ जान-ए-जिगर साथ है,कुछ नए जज़्बात साथ है।मेरे हमनवाज हमसफ़र साथ हैं,मुस्कुराहटों में निकल रहे लम्हे साथ हैं।इन लमहों में सिमटे कुछ लम्हे साथ हैं,बंद आँखों में निकले नमकीन अश्क़ साथ हैं।तुम्हारी इस ज़रा-नवाजी से शुक्रगुज़ार हुए सन्यासी के ये जज़्बात साथ हैं।

वक़्त से रुसवा हो ऐसे चले थे कि बेपरवाह हो गए

वक़्त से रुसवा हो ऐसे चले थे कि बेपरवाह हो गए ,उसने जाने अनजाने याद रखा और ख़ैरखवाह हो गए।बेरुख़ी समझी हमने परवरदेगार की सन्यासी हो गए,खरखवाहों में रह कर भी बेमुराव्वत लापरवाह हो गए।कुछ जुनून तो है नौजवान-ए-हिंद में कर गुज़रने को,ज़लज़ले से निकली लहरों में खड़े बंदरगाह हो गए ।फ़लसफ़े ज़िंदगी ने लिखे बेइंतहा … Continue reading वक़्त से रुसवा हो ऐसे चले थे कि बेपरवाह हो गए

बेख़बर इंसान से ये पूछो की कैसे

बेख़बर इंसान से ये पूछो की कैसेकरे इतना अभिमान चढ़ेगा सूली पर कैसे ।उसने इसे बनाया क्या सोच करबनेगा मेरा प्रतिबिंब चढ़ेगा सूली पर कैसे।दशों दिशाओं का ज्ञानी हो कर भी रावणलाया सीता को हर , चढ़ेगा सूली पर कैसे ।था बस सूली पर चढ़ना ईसा के ही बस मेंतृष्णाओं को अपनाए चढ़ेगा सूली पर … Continue reading बेख़बर इंसान से ये पूछो की कैसे

इन बेपरवाह मौसमों को ऐसे करें रुसवा

बेपरवाह मौसमों को रुसवा हम कर निकलेशमा जैसे पूरे मैखाने को रोशन कर निकले ।आते है मौसम अलग अलग इंतज़ाम लिए हर मय जैसे तासीर अपनी अलग कर निकले।बैठे हम इन मौसमों में खोए हुए इस क़दर जैसे किसी परिंदे के बचों के पर निकले।कर जाएँ इनकी रुहानियत को बस में मैखाने को ख़ाली शराबी कर निकले।बेपरवाही इनमें हमारे … Continue reading इन बेपरवाह मौसमों को ऐसे करें रुसवा

तुम्हारी ज़रा-नवाज़ी के क़ायल हुए हम ऐसे

तुम्हारी ज़रा-नवाज़ी के क़ायल हुए ऐसेजैसे बर्फ़ किसी मय में मिल पिघले ।आए थे तेरे कूचे पर बेख़बर यूँ तो जैसे खुदा की तलाश में जोगी चल निकले ।थाम कर हाथ मेरा बैठा दिया मैखाने में यूँ जैसे मय की तासीर को परख हल निकले।एक शोख़ शमा इधर जलने को है और हमपरवाने  हो जाएँ , ये … Continue reading तुम्हारी ज़रा-नवाज़ी के क़ायल हुए हम ऐसे

कहाँ है वो जगह जहाँ सुकून-ए-जहाँ मिलते हैं

कहाँ है वो जगह जहाँ सुकून-ए-जहाँ मिलते हैंदिखाते सभी वो मंज़र, जहाँ सभी मसरूफ मिलते है ।हम भी निकले हैं उस निगेहबाँ की खोज में कहते हैं आग़ोश में उसकी, खुदा मिलते हैं ।पहुँचा हूँ मैखाने में अभी, ना समझना मुझे शराबीयहाँ दिल से निकले आँसूओं के, हिसाब मिलते है ।क्या बेरुखियों के चलते कमस्कम इतनी … Continue reading कहाँ है वो जगह जहाँ सुकून-ए-जहाँ मिलते हैं